जुल्फ़ के वो क़रीब लगता है !
देखिये खुश नसीब लगता है !
वक़्त एसा भी इश्क में आता !
आएना भी रकीब लगता है !
ताज पहना है जब से उल्फ़त का !
शाह मुझ को ग़रीब लगता है !
दिल के बदले हज़ार ग़म लेना !
फ़ैसला ये अजीब लगता है !
हर कदम साथ-साथ चलता है !
दर्द सब से क़रीब लगता है !

prem ki rachate rahiye gazzal.
ReplyDeleteवाह बहुत सुंदर.
ReplyDeleteरामराम.
आपका लेख पड्कर अछ्छा लगा, हिन्दी ब्लागिंग में आपका हार्दिक स्वागत है, मेरे ब्लाग पर आपकी राय का स्वागत है, क्रपया आईये
ReplyDeletehttp://dilli6in.blogspot.com/
मेरी शुभकामनाएं
चारुल शुक्ल
http://www.twitter.com/charulshukla