Tuesday, October 20, 2009

जुल्फ़ के वो क़रीब लगता है !

देखिये खुश नसीब लगता है !

वक़्त एसा भी इश्क में आता !

आएना भी रकीब लगता है !

ताज पहना है जब से उल्फ़त का !

शाह मुझ को ग़रीब लगता है !

दिल के बदले हज़ार ग़म लेना !

फ़ैसला ये अजीब लगता है !

हर कदम साथ-साथ चलता है !

दर्द सब से क़रीब लगता है !

3 comments:

  1. वाह बहुत सुंदर.

    रामराम.

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  2. आपका लेख पड्कर अछ्छा लगा, हिन्दी ब्लागिंग में आपका हार्दिक स्वागत है, मेरे ब्लाग पर आपकी राय का स्वागत है, क्रपया आईये

    http://dilli6in.blogspot.com/

    मेरी शुभकामनाएं
    चारुल शुक्ल
    http://www.twitter.com/charulshukla

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